Ratish Roushan Upadhyay : Advocate, Civil Court Ranchi
खूंटी पर टंगी हूई मेरी कोट
आज रुंआसी होकर मुझसे बोली,
आखिर कब तक टंगी रहूँ मैं
कोरोना के डर से हमजोली,
बेहतर थी वो कोर्ट की धुप
और उड़ती धुल की होली,
बारिश चाहे जितना भिगो दे
पर मैंने कभी मुंह नहीं खोली,
खूंटी पर टंगी हूई मेरी कोट
आज रुंआसी होकर मुझसे बोली|
बहस को जाते थे तुम जब भी
सदा तुम्हारे साथ मैं हो ली,
भले उड़ी हो रंगत मेरी
पर कभी तुम्हारी पोल न खोली,
जीत में जब जब खिली तुम्हारी बांछें
तब तब मैं भी गदगद हो ली,
हार में मुरझाए तुम जब भी
मन ही मन मैं भी रो ली,
पर इस तरह टंगे टंगे अब ऐसा लगता है
जैसे मैं फांसी की तख्त पर झूली,
खूंटी पर टंगी हूई मेरी कोट
आज रुंआसी होकर मुझसे बोली|

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