जिल्लत की जिंदगी से इज्जत की मौत अच्छी:रतीश रौशन उपाध्याय

जिल्लत की जिंदगी से इज्जत की मौत 

अच्छी:रतीश रौशन उपाध्याय





अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान के खिलाफ गन(बंदुक) उठाने के बजाय धन उठाकर देश छोड़कर भाग जाना उचित समझा और वह ओमान जाकर शिफ्ट हो गए, उन्होंने अफगानी स्त्रीयों और बच्चों का भी ख्याल नहीं किया और राष्ट्र को विपत्ति में छोड़कर पलायन कर गए ताकि स्वयं सुख सुविधा की जिंदगी जी सकें ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी से तो बेहतर था कि तालिबान के खिलाफ लड़ते हुए युद्ध में शहीद हो जाते इतिहास उन्हें याद रखता परंतु कायरों का कोई इतिहास नहीं होता है ।अगर वह तालिबान के खिलाफ युद्ध लड़ते तो इस बात की पूरी संभावना थी कि विश्व समुदाय उन्हें युद्ध में मदद करता हो सकता था वह अपना गौरव बचाने में सक्षम हो जाते और अफगानिस्तान तालिबान की त्रासदी में नहीं फंसता ,परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया उनकी जिंदगी अब जिल्लत भरी ही गुजरेगी क्योंकि उन्होंने अफगानी समाज के बीच अपना मान सम्मान और प्रतिष्ठा पूरी तरह से खो दिया है। इस घटना से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपना शासक कभी कमजोर नहीं चुनना चाहिए जब राष्ट्र हित की बात आए तो उसे भावनात्मक नहीं बल्कि दुश्मन के विरूद्ध बिल्कुल निर्दई होना चाहिए।
हम खुशनसीब हैं कि हम भारत देश में रहते हैं जहां की भूमि महाराणा प्रताप, चंद्र शेखर आजाद ,भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे असंख्य वीरों कि रक्त से सिंचित है। यह भगवान कृष्ण की भूमि है जो शांति के लिए बांसुरी भी बजाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर दुश्मन का सर कलम करने के लिए सुदर्शन चक्र भी चलाते हैं।
हमें गर्व है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री भले ही हमें महंगी पेट्रोल, डीजल और अन्य वस्तुएं मुहैया करा रहा है ,परंतु ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न होने पर वह देश छोड़कर भागेगा नहीं बल्कि दुश्मन को पाताल से कोड़ कर भी निकाल लेगा।
इतिहास के पन्नों में सदैव वीरों की गाथा लिखी जाती है अशरफ गनी जैसे कायरों का उसमें कोई स्थान नहीं होता है।
इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है की विषम परिस्थिति में राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दे क्योंकि जिल्लत की जिंदगी से इज्जत की मौत सदैव बेहतर होती है।
रतीश रौशन उपाध्याय

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