श्री महाचित्रगुप्त पूजन पर विशेष

श्री महाचित्रगुप्त पूजन पर विशेष

कायस्थों से अपनी सर्वश्रेष्ठ भूमिका

 के निर्वहन की अपेक्षा




- डॉ.प्रणव कुमार बब्बू
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा.



श्री चित्रगुप्त जी महाराज के हाथों में वर्तमान कलम-दवात, इस बात का प्रतीक है कि हमारे आराध्य पूरी तरीके से रचनात्मक, क्रियात्मक और सकारात्मक हैं. इसके अलावा भगवान श्री चित्रगुप्त की पूर्ण प्राथमिकता इस बात पर भी है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पूरी निष्ठा, कर्तव्य परायणता और समर्पण के साथ इस जगत में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें. अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करें. सर्वश्रेष्ठ कार्य करे. अपने आराध्य... अपने भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के आदेश पर चलते हुए अधिकांश कायस्थ अथवा चित्रांश अपने स्तर से इस बात का भरपूर प्रयास करते रहे हैं करते रहेंगे.

सन 2019 के अंतिम महीनों से शुरू वैश्विक महामारी कोरोना के कारण दुनिया के अधिकांश देशों को प्रकृति ने यह बता दिया है कि चाहे जितना भी प्रयास किया जाये लेकिन प्रकृति पर हावी होने, उसे छेड़ने या उसे पराजित करने के संदर्भ में हम कोई भी कल्पना नहीं करें. यही बेहतर होगा.

मानवीय सभ्यता की शुरुआत से ही प्रकृति और मनुष्य में हमेशा से एक सतत संघर्ष चलता रहा है जो बहुत बार प्रकृति की इच्छा के विरुद्ध ही होता है. मनुष्य ने हमेशा विकास किया और यह बहुत ही अच्छी बात है. लेकिन मनुष्य के प्रत्येक कर्म को विकास का नाम देना आत्मघाती है.

सकारात्मक-रचनात्मक बनकर हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ करने के संदर्भ में हमें ईश्वर या प्रकृति से हमेशा ही प्रेरणा मिलती रही है. पर समस्या तब होती है जब हम अपने दायरे का उल्लंघन करें और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करें, उसे पराजित करने और उसपर हावी होने का प्रयास करें.

जगत के सृजनकर्ता भगवान श्री ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है. श्री चित्रगुप्त जी के हाथों में कलम-दवात पूरी तरीके से रचनात्मकता और सकारात्मक होने का संदेश देता है. साथ ही यह भी बताता है कि ज्ञान, जानकारी और सूचना को किसी भी दृष्टिकोण से हम कम करके कभी भी नहीं आंके.

पूरी दुनिया में कायस्थ चाहे जहाँ भी रह रहे हैं लेकिन उन्होंने हमेशा ही समय, काल, परिस्थिति और क्षेत्र के अनुरूप अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का प्रयास किया है और यह प्रयास निरंतर जारी भी है. आदिकाल से अबतक और आनेवाले समय में भी कायस्थ अपनी भूमिका का सटीक निर्वहन करते रहेंगे क्योंकि यही हमारे मूल स्वभाव में है और प्रकृति की तरह हम भी नहीं बदलते.

कायस्थों ने पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा कायम की है और उन्होंने समाज तथा देश में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है. लेकिन बदली हुई परिस्थिति में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि एक ओर तो हम समाज, देश और दुनिया में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें लेकिन इसके साथ-साथ बिना किसी भेदभाव के सभी की सहायता और सेवा करने के प्रति कहीं ज्यादा समर्पित हों, समर्थ बने. यह तभी हो सकता है जबकि सकारात्मकता, रचनात्मकता, क्रियात्मकता के साथ अधिक से अधिक ज्ञान, जानकारी और सूचना को हम प्राप्त कर उसका सदुपयोग करें.

कोविड-19 से दुनिया को जान-माल का बहुत अधिक नुकसान उठाना पड़ा है और आज के परिप्रेक्ष्य में यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण है कि हम अपनी भूमिका का सटीक-सही तरीके से और पूरी पारदर्शिता, बुद्धि-विवेक से निर्वहन करें क्योंकि कायस्थों की समृद्ध परम्परा हमेशा से यही रही है.

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