इतिहास के पन्नों से : झारखंड के देवघर
मे जान लेवा हमला हुआ था
26 अप्रैल1934 मे देवघर का जानलेवा हमला गांधी पर पहला हमला था
गांधी पर जानलेवा हमला मुस्लिम समर्थक या पाकिस्तान
को55 करोड़ रुपए दिलाने के जिद के कारण नही बल्कि
दलितों के मंदिर प्रवेश कराने के कारण हुए थे
2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 151 वी जन्मदिन देश और दुनिया में मनाया गया , महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने वालों में जो दिखाई दे रहे हैं उनमें बहुत सारे वैसे लोग हैं जो गांधी के हत्या के लिए दोषी लोगों का भी अनुयाई है। अभी तक गांधी के हत्या के जो कारण भारतीय जनमानस में समझाया गया है या बताया गया है उससे बिल्कुल है अलग कारण इतिहास के पन्नों के अध्ययन करने से मिल रहा है । गांधीजी के हत्या 30 जनवरी 1948 को हिंदू महासभा और विनायक दामोदर सावरकर के अभिनय शिष्य नाथूराम गोडसे तथा उसके साथियों द्वारा संध्या 5:00 बजे दिल्ली के बिरला भवन में प्रार्थना के लिए जाते समय गोली मारकर कर दिया गया था कारण जो बताए गए उसमें महात्मा गांधी का मुस्लिम हितैषी होना, मुस्लिमों को भारत में रहने का अनुमति देना और पाकिस्तान के हिस्से में बंटवारे का ₹55करोड़ रुपए को दिलवाने के लिए अनशन पर बैठना मुख्य रूप से बताया जाता है लेकिन उनकी हत्या के पूर्व कई बार उन पर जानलेवा हमला किया गया लेकिन गांधी बार-बार बाल-बाल बचते गए । हत्या के मूल कारणों में जो भारतीय समाज में सनातन धर्म या हिंदू धर्म में संचालन का मनुवादी जो नियम था जिसके कारण दलितों के साथ छुआछूत और भेदभाव चरम सीमा पर था जिसको समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी ने अथक प्रयास किया मनुवादी समाज को नागवार गुजर रहा था लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1932 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के साथ किए गए पूना पैक्ट अर्थात पूना समझौता के कारण वचनबद्ध थे 1930, 1931 और 1932 मे लंदन के गोलमेज सम्मेलन में पारित प्रस्तावों के अनुसार ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को स्थानीय स्वशासन देने के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू किया गया था तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्रीराम से मैकडोनाल्ड भारत में सांप्रदायिक आधार पर चुनाव कराने का नियम पारित किया था जिसमें सभी धर्मों के लिए अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण किया था उसी क्रम में अनुसूचित जातियों के लिए भी अलग चुनाव क्षेत्र हिंदू धर्म से अलग होकर देने का नियम बनाया था लेकिन महात्मा गांधी चाहते थे कि दलित या अनुसूचित जातियां हिंदू समाज में ही रह कर चुनावी प्रक्रिया में भाग ले उन्हें सीटों का आरक्षण दिया जाए नकी हिंदू धर्म से अलग, लेकिन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर दलितों और अनुसूचित जातियों के साथ सदियों से मनुवादी लोगों द्वारा शोषण , अत्याचार , भेदभाव और छुआछूत जैसे व्यवहार से बहुत ही दुखी रहते थे और वह ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए इस निर्णय के साथ पूरी तरह से सहमत थे । महात्मा गांधी जेल में रहते हुए इसके खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए और यह घोषित किए कि जब तक इस नियम को समाप्त नहीं किया जाएगा और अंबेडकर इस पर सहमत नहीं होंगे तब तक मेरा आमरण अनशन जारी रहेगा , आमरण अनशन के कारण महात्मा गांधी का तबीयत बहुत खराब होने लगा जिसके कारण डॉ आंबेडकर पर भारी दबाव होने लगा और बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अंबेडकर से आग्रह किया कि श्री गांधी से वार्ता करें और उनकी प्राणों की रक्षा करें , नहीं चाहते हुए भी डॉक्टर अंबेडकर महात्मा गांधी के पास गए और गांधी के विचारों से सहमत हुए गांधी जी ने उसी दिन अंबेडकर के समक्ष यह प्रतिज्ञा किया कि जब तक सनातन धर्म में दलित और अनुसूचित जातियों को पूर्ण सम्मान नहीं दिलाऊंगा तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगा मैं विश्राम नहीं करूंगा और गांधीजी अंबेडकर को दिए इस वचन के लिए संपूर्ण देश का दौरा करने लगे और दलितों को मंदिर प्रवेश का अभियान शुरू किया । 1932 में ही दक्षिण भारत में कई मंदिरों में जाकर दलित वर्ग के लोगों को मंदिर प्रवेश कराया हालांकि कई जगह दक्षिण भारत में गांधी को सवर्ण समाज का भारी विरोध का भी सामना करना पड़ा कालीकट और गुरुवायूर के प्रसिद्ध मंदिर में दलितों के प्रवेश कराने के अभियान का भारी विरोध का सामना करना पड़ा गांधी को काला झंडा दिखाया गया और काली हण्डी लेकर विरोध प्रदर्शन भी किया गया इस बीच महात्मा गांधी सवर्ण समाज को यह समझाने का प्रयास किया कि दलित और अनुसूचित जातियां भी मेरे भाई हैं इनके साथ भाईचारे का व्यवहार करो और इन्हें अपनाओ ।
महात्मा गांधी झारखंड में उसके पहले 3 अक्टूबर 1925 को देवघर आए थे उस वक्त देवघर के पंडों और अन्य लोगों ने जोरदार स्वागत किया था लेकिन 26 अप्रैल 1934 को जब दुबारा महात्मा गांधी देवघर पहुंचे तो जसीडीह रेलवे स्टेशन पर पंडा समाज और वर्णाश्रम स्वराज संघ के लोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया उनकी कार को पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया गया लेकिन महात्मा गांधी बाल-बाल बच गए हमले से महात्मा गांधी काफी दुखी हुए और उसके बाद आयोजित आमसभा में महात्मा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में सब को समझाने का काम किया कि मैं जोर जबरदस्ती से यह अभियान अर्थात दलितों को मंदिर प्रवेश का अभियान नहीं चला रहा हूं जहां लोग सहमत हो रहे हैं वहीं पर मैं दलितों को मंदिर प्रवेश करा रहा हूं , गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि अगर मुझे यह मालूम हो जाए कि कोई मंदिर जबरदस्ती या लोगों के ऐसी सहमति के बिना खोला गया है तो मैं उस मंदिर को पुनः हरिजनों के लिए बंद कर देने का आकाश पताल एक कर दूंगा निश्चय ही मानता हूं कि प्रत्येक सवर्ण हिंदू का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह सन 1932 में मेरे उपवास के दौरान मुंबई में हरिजनों से की गई अपनी पवित्र प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए सभी उपाय करें इस प्रतिज्ञा में यह बात भी कही गई है कि आवश्यकता पड़ने पर कानून बनवाने का भी यत्न किया जाएगा ।
25 जून 1934 को महात्मा गांधी पर पुणे में हिंदू महासभा के लोगों ने जानलेवा हमला किया महात्मा गांधी पुणे के निगम सभा भवन में आयोजित सभा में भाग लेने के लिए अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ सभा स्थल पर जा रहे थे आयोजक दो कार रखे थे और दोनों ही कार एक जैसे थे सभा स्थल के पहले रेलवे फाटक पर गांधी की गाड़ी रेलगाड़ी क्रॉस करने के कारण रुक गई थी जबकि दूसरी गाड़ी सभा भवन के पास पहुंच गई और गाड़ी से अभी लोग उतरे भी नहीं थे की बम से हमला किया गया और गाड़ी का चिथड़ा उड़ गया इस हमले में निगम के मुख्य अधिकारी और सात अन्य लोग मारे गए थे इस हमले में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे का नाम आया था हिंदू महासभा के लोग महात्मा गांधी के अछूत उधार के कार्यक्रम से काफी गुस्से में रहते थे । दोनों कार एक जैसे होने के कारण हमलावर यह अनुमान नहीं लगा पाए कि महात्मा गांधी किस गाड़ी में हैं , सभा स्थल पर पहुंची पहली गाड़ी को ही गांधी की गाड़ी समझकर बम से जानलेवा हमला किया गया बाद में सभा स्थल में पहुंच कर गांधी ने अपना भाषण दिया ।
फिर 1944 में मुंबई के पंचगनी में महात्मा गांधी पर जान हमला हुआ फिर मुंबई में ही गांधी पर जानलेवा हमला किया गया ।
1946 में भी गांधी जब रेल यात्रा पर थे तो रेल की पटरियां उखाड़ दी गई थी और रेलगाड़ी नरूला के पास जाकर पलट गई लेकिन गांधी बाल-बाल बच गए ।
20 जनवरी 1948 को गांधी पर जानलेवा हमला हिंदू महासभा के मदनलाल पाहवा ने बम फेंककर किया लेकिन बम फटा नहीं और मदन लाल पहावा पकड़ा गया उसके बाद पूरी प्लानिंग के साथ नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गांधी जी के हत्या करने में सफल हो गया ।
क्या यह प्रमाणित नहीं कर रहा है कि गांधी की हत्या केवल पाकिस्तान और मुस्लिमों के कारण नहीं बल्कि महात्मा गांधी द्वारा दलितों को हिंदू समाज में सम्मानजनक स्थिति प्रदान करने के कारण किया गया था ?
गांधी के हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किए गए मुख्य अभियुक्तों में विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम गोडसे ,नाना आप्टे ,करकरे, मदनलाल पाहवा ,शंकर किस्तैया, गोपाल गोडसे, डॉक्टर परचुरे और दिगंबर बरगे शामिल था।
विनायक दामोदर सावरकर देश के नामी-गिरामी उस वक्त के वकीलों को नियुक्त किया था और अपनी कुटिलता के कारण गांधी के हत्या के आरोप से बरी हो गया था फैसला 10 फरवरी 1949 को आया था जिसमें नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे को फांसी की सजा और अन्य को आजीवन कारावास की सजा विशेष न्यायालय के न्यायाधीश आत्मा चरण ने सुनाई थी। सबसे आश्चर्यजनक बात महात्मा गांधी के हत्या में आर एस एस के दूसरे गुरु माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर का अभियुक्त होना है, गोलवलकर को 1 फरवरी 1948 को नागपुर से गिरफ्तार किया गया था गांधी वध षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार आर एस एस के दूसरे गुरु गोलवलकर को 6 माह बाद 6 अगस्त 1948 को रिहा किया गया था लेकिन रिहाई के बदले कुछ उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जैसे नागपुर नगर निगम क्षेत्र में ही रहना राजनीतिक भाषण देना या लिखना बयान जारी करना आदि मना था । गोलवलकर को मध्य प्रदेश के बैतूल जेल में रखा गया था हालांकि बैतूल जिला भूतों के मेला के कारण प्रसिद्ध है गोलवलकर को बैरक नंबर एक में रखा गया था
2016 में वर्तमान आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने बैतूल के जेल में जाकर गोलवलकर को श्रद्धांजलि दी थी ।
मनोहर कुमार यादव
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष समाजवादी पार्टी झारखंड।
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