पितृ दिवस के शुभ अवसर पर मेरी यह कविता आप सभी के पूज्य पिताजी के चरणों में सादर समर्पित है, यद्यपि हमारी भारतीय संस्कृति में प्रत्येक दिन ही मातृ-पितृ दिवस होता है क्योंकि दिन की शुरुआत ही उनके चरणवंदन से की जाती है ।
बाबूजी (पिताजी )
अबोध थे हम,अंगुलियां पकड़कर
वे हमे चलना सिखलाते थे ,
चलते चलते जब कभी हम
औचक ही गीर जाते थे,
दर्द से कराहते थे जब हम और
हमारे घुटने छील जाते थे,
दुलराते पुचकारते बाबूजी तब
बेचैन होकर हमारे जख्मों को सहलाते थे।
अक्सर प्रभात की बेला में
हम संग संग घुमने जाते थे,
थक जाते थे जब कभी हम
तब उनके कंधे पर चढ़ जाते थे,
कुछ दुर बढते थे जब बाबूजी
तब हम जीद पर अड़ जाते थे,
मिठाई जलेबी लिए बगैर हम
घर वापस नहीं आते थे ।
होली, दिवाली , दशहरा हो
या हो कोई और त्यौहार ,
नए कपड़े ,खिलौने लेने को
बाबूजी रहते थे सदैव तैयार,
बिता वक्त, बिती यादें अब
तरूण अवस्था आ गई,
हमारी शिक्षा दीक्षा की जिम्मेवारी भी
अब बाबूजी पर आ गई।
हमें नई दिलाने को
स्वयं पुरानी भी सी लेते थे बाबूजी,
खुद कष्ट सहते थे और
अभाव में जी लेते थे बाबूजी,
हमारी खुशियों की खातिर अक्सर
हर गम पी लेते थे बाबूजी ।
बड़े नाजों से पाला था हमें
पलकों पर बिठा कर रखा था,
हर लम्हा अपना था और
जीवन हसीन एक सपना था,
बच्चपन का वात्सल्य था वह
खुलकर जीने का मौका था,
बाबूजी के राज में
जीवन सचमुच अनोखा था ।
सच्चे आदर्श हैं हमारे
हमको उनपर नाज है,
उनकी कल की कुर्बानी पर
चमक रहा हमारा आज है,
शत् शत् नमन है उनको
यह जीवन उन्ही की देन है,
उनके सानिध्य में मिलता
मुझे परम पिता का प्रेम है ।
. रौशन उपाध्याय, अधिवक्ता सिविल कोर्ट रांची -834001झारखंड ।

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