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श्रावण-पूर्णिमा को रक्षाबंधन और संस्कृत-दिवस दोनों मनाया जाता है। एतदर्थ मैं संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में एक रचना जय-जय-जय संस्कृत-भाषा आपके विचारार्थ प्रेषित कर रहा हूँ!लेखक - योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे. पी. मिश्र)
जय-जय-जय संस्कृत भाषा
आदि ग्रथों को देनेवाली,
भाषाओं की तुम जननी;
एक सूत्र में पिरोनेवाली-
तुम केवल ही इस अवनी!
वेद वाङ्मय पाल अंक में-
दी तुमने ऋचा को वाणी;
देवमुख से नि:सृत हो तुम-
विद्वत् जन की अभिज्ञानी!
तुमको भला विस्मृत करके-
बन सकता है कौन ज्ञानी;
आज भले तुम अप्रचलित हो-
तुमसे भाषाओं की रवानी!
समता का जो पाठ पढ़ाती -
वह कैसे विशेष की वाणी;
समकृत जिसका रूप ही है-
उस हित ऊँच-नीच बेमानी!
उस सुसंस्कृत-भाषा की-
धुन अलख आज हम जगायें;
देश को एक में जो जोड़ती-
उसको सब मिल शीश नवायें!
पावस के इस पावन दिन में-
रक्षाबंधन माल्य एक बनायें;
मनका जिसका हो सर्वभाष्य-
संस्कृत-सूत्र में उसे पिरोयें!
तभी ग्रंथ से बाहर निकल-
होगी यह जन-जन की भाषा;
तभी कहना होगा सार्थक-
जय-जय-जय संस्कृत भाषा!

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