कहानी - कोरोना गांव
उनतीस दिसंबर दो हजार पच्चीस की सुबह पांच बजे का समय था । हवाई जहाज में बैठते ही रोज ने लिलि से कहा था - " हम भारत पहुंचते ही सबसे पहले कोरोना गांव जाएंगे, अपने नववर्ष का पहला दिन वहीं मनाएंगे ! फिर हिमालयन रेंज वाली चार धाम की यात्रा करेंगे ! फिर तुम जहां चाहो वहां चलेंगे ! "
" जैसा तुम्हारा आदेश डार्लिंग ! मुझे तो तुम्हारी भारत भ्रमण की प्रगाढ़ इच्छा पूरी करने का अपना वादा निभाने की खुशी है । तुम साथ हो यही काफी है मेरे लिए ! मैं दुनिया के किस देश या स्थान में हूँ या रहूँगा, यह मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता ! " कहते हुए लिलि चहका था ।
" आइ लव यू लिलि ! मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मुझे तुम्हारे जैसा दोस्त और पति मिला ! पांच साल पहले मेरे डॉक्टर माता-पिता कोरोना संक्रमण से लोगों की जान बचाते हुए खुद अपनी जान गंवा बैठे थे । ठीक उसी समय मेरा प्रिय मित्र जार्ज भी, तब जब मैं बिल्कुल अकेली पड़ गई थी, तुमने ही मुझे मेरे माता-पिता की तरह जीने का हौसला दिया और रास्ता दिखाया था । फिर इस साल के प्रारंभ में जब से मैंने भारत के कोरोना गांव की कहानी सुनी है, मैं भारत जाने को उतावली थी और देखो, इसी वर्ष ! आज ! भारत की यात्रा पर हूँ ! धन्यवाद लिली ! " कहते हुए रोज ने खुशी से लिलि को चूम लिया था ।
मीठी यादों और बातों में दो दिन का सफर ऐसे बीता, मानों घंटे दो घंटे का समय व्यतीत हुआ हो । दुनिया के सबसे विकसित देश कहे जाने वाले अमेरिका की राजधानी में रहते ये दो युवा प्रेमी आज पांच वर्ष पहले भारत के पिछड़े राज्य कहे जाने वाले झारखंड के सबसे अशांत जिले रहे लातेहार के एक छोटे से विकसित गांव कोरोना की यात्रा पर थे । महज तीन हजार आबादी वाले इस गांव की खूबसूरती और व्यवस्था की चर्चा पूरी दुनिया में हो चुकी थी । लगभग तीन किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस गांव में आज दस होटल, एक सिनेमा हॉल और दो पार्क के साथ एक छोटे से वाटर पार्क की भी बेहतर सुविधा थी ।
" कोरोना गांव - दो किलोमीटर का बोर्ड पढ़ते ही लिलि ने टैक्सी ड्राइवर से कहा था - " यहां के सबसे अच्छे और बड़े होटल में ले चलो । "
" साब जी, इस गांव में कोई भी मकान या होटल तीन मंजिला से ज्यादा नहीं । सबसे अच्छी होटल में बीस झोपड़ीनुमा कमरे हैं । शौचालय और एक छोटे बरामदे के साथ ! चारों तरफ खिड़कियां हैं और रात में यदि ग्राहक चाहे तो कमरे की छत भी खुल जाती है ! अर्थात उपर खुला आसमान भी कमरे की छत हो सकता है ! दो डीलक्स कमरे हैं, जो झूले की तरह झूलते भी रह सकते हैं ! सबसे बड़ी खासियत यह कि हर कमरा एक छोटे बगीचे के बीच है । "
" ठीक है, फिर तो हमें उसी होटल में ले चलो । " रोज ने चहकते हुए कहा था ।
गांव के प्रारंभ में एक बोर्ड लगा था । जिस पर लिखा था - सावधान ! गांव के लिए अधिकतम गति 30 किलोमीटर प्रति घंटे है, उल्लंघन करने पर दस हजार रुपए का न्यूनतम जुर्माना लिया जाएगा । नीचे लिखा था - सड़क किनारे लगे किसी भी पेड़-पौधे को छूना वर्जित होने के साथ दंडनीय अपराध है ।
गांव में प्रवेश करते ही उन्हें ऐसा लगा मानो किसी बड़े फिल्मी स्टुडियो में पहुंच गए हो । सड़क किनारे गांव के हर घर के सामने हरे-भरे फलदार वृक्षों के साथ फुल के पौधे लगे थे । आम, अमरूद, अनार, शरीफा, केला, नाशपाती जैसे वृक्षों को यूं सड़क किनारे देखना उनके लिए अकल्पनीय था । हर घर के सामने बांई तरफ एक बड़ा डस्टबिन रखा था । वे दोनों कभी सड़क किनारे फल और फूल से लदे वृक्षों और पौधों को देखते तो कभी एक-दूसरे का
मुखड़ा !
ड्राइवर ने कार एक होटल के सामने रोकी थी । उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें उस होटल में रोज की पसंद का झूलते रहने वाला कमरा मिल गया था, जो महीने भर पहले से बुक था और अभी कुछ देर पहले ही कैंसल किया गया था । रोज बहुत खुश थी तो स्वाभाविक रूप से लिलि भी । दोनों कमरे में पहुंचते ही एक साथ फ्रेश होने के लिए गुसलखाने में चले गए थे !
शाम को वे गांव घूमने निकले तो रोज ने होटल मैनेजर से पूछा था - " हम इस गांव के बारे में कुछ जानना चाहते हैं ! "
" जी अवश्य ! बताएं क्या जानना चाहते हैं आप ? " मैनेजर ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से कहा था ।
" सबसे पहले तो यह, कि इस गांव का नाम कोरोना गांव क्यों ? यह इस रूप में कब विकसित हुआ ? किसने किया यह सब ? "
मैनेजर रोज की जिज्ञासा देख मुस्कराता हुआ बोला था - " इस गांव का नाम कोरोना गांव इसलिए है कि जब वर्ष 2020 में एक षड्यंत्र के तहत चीन द्वारा फैलाई गई बीमारी कोरोना ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया था तब इस गांव की एक साधारण महिला करनी देवी ने, जो आज भी यहां की प्रमुख है, इस गांव को एक विकसित गांव बनाने का संकल्प लिया था और फिर उसे सच भी कर दिखाया । उन्होंने ही इस गांव का नाम कोरोना गांव रखा
था । "
मैनेजर क्षण भर को रूका ही था कि रोज अधीर हुई पूछी थी - क्या उनके साथ भी उस समय कोई दुखद हादसा हुआ था ? "
" जी, हुआ था । उस समय गांव में यातायात पूरी तरह बंद था और दुर्भाग्य से गांव के किसी व्यक्ति के पास एक भी चार पहिया वाहन नहीं था । उसी दौरान उनके पति की तबीयत बिगड़ी और चिकित्सा के अभाव में उनकी मृत्यु हो गई । फिर अगले कुछ दिनों में गांव से कमाने के लिए बाहर गए कुछ लोगों की दर्दनाक मौत हुई । तभी करनी देवी ने संकल्प लिया था कि वह इस गांव को इस राज्य का ही नहीं देश का सबसे विकसित गांव बनाएगी । ऐसा गांव, जिसका देश के ही नहीं विदेश के लोग भी दर्शन और अनुकरण करेंगे । देखिए, आज ऐसा ही है ! आपकी तरह कई विदेशी पर्यटक इस गांव को देखने आते हैं । "
" पर उनका नाम तो करनी देवी - - -
" हाँ, पर यह महज संयोग है । उन्होंने इस गांव का नाम अपने नहीं, कोरोना महामारी के नाम पर रखा है ! उनका मानना है कि यह उस बीमारी के दुर्भाग्य से उपजा सौभाग्य है ! इस नाम के माध्यम से वे इस गांव में उत्पन्न होने वाली अगली पीढ़ियों को यह संदेश भी देना चाहती हैं कि वे भविष्य में कभी भी किसी भी बीमारी या महामारी से निपटने के साहस और सुविधा से युक्त रहें । वे जानती हैं कि भविष्य में कोरोना महामारी का जिक्र होता रहेगा और इसी बहाने इस गांव की संतानें यह जानने का प्रयास जरूर करेंगी कि उसके गांव का नाम कोरोना क्यों रखा गया ? इसके पीछे क्या उद्देश्य था ? "
" कहां रहती हैं वे ? उनसे हम मिलना चाहते हैं ! "
" कल शाम हमारे ही होटल के बगीचे में एक छोटी सी पार्टी है उनकी । हम आपको उनसे मिलवा देंगे । "
" नाइस ! दिस इज आवर गुड लक ! अच्छा अब हम आपका गांव घूमकर आते हैं ! "
" जी, बिल्कुल ! आशा है आपने गांव घूमने के लिए जरूरी हिदायतें पढ़ ली होगी, किसी भी वृक्ष या पौधे को नहीं छूने की बात याद रखिएगा । "
" जी, अच्छा हुआ आपने ये बात याद दिला दी ! मैं जानना चाहती हूँ कि सड़क किनारे लगे इन वृक्षों के फल का उपयोग कौन करता है ? " पूछते हुए रोज के चेहरे पर जिज्ञासा के भाव थे ।
मैनेजर ने मुस्कराते हुए कहा था - " आने वाले हर यात्री यह सवाल जरूर पूछते हैं ! सड़क किनारे पेड़-पौधों की देखरेख जिनके घर के सामने है, वे करते हैं पर उनके फल और फूल की बिक्री ग्राम विकास समिति के लोग करते हैं । इसके साथ गांव में बने पार्क और तालाब में किए गए मछली पालन से जो आय होती है, उसे गांव के विकास और सुरक्षा पर खर्च किया जाता है । आपकी जानकारी के लिए बता दूं, इस गांव के हर घर के पीछे भी आपको फलों के कई वृक्ष मिलेंगे । इस गांव के हर घर में आपको गाय भी अवश्य मिलेगी । इस गांव की समृद्धि और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा साधन फल, फूल, सब्जी और दुध है । पिछले दो-तीन वर्षों से यहाँ पर्यटन भी तेजी से बढ़ा है । आसपास के शहरों के साथ देश दुनिया से लोग यहां शांति और सुकून के लिए आते हैं ! "
रोज और लिलि मैनेजर की बात बड़ी उत्सुकता से सुन रहे थे ।
मैनेजर ने मुस्कराते हुए कहा था - बाकी कल करनी देवी से मिलेंगे तब ! फिलहाल शाम होने वाली है, आप गांव घूम आएं । बेहतर होगा पहले राइट साइड घूम आएं, अभी पार्क में आपको बहुत अच्छा लगेगा ! फिर लेफ्ट साइड चले जाना । यदि आप चाहें तो बाहर कुछ साइकिल भी रखी है, आप उसका बेहिचक उपयोग कर सकते हैं । "
" ओके, थैंक्स ! " कहते हुए दोनों होटल से बाहर निकल गए थे । दोनों ने एक-एक साइकिल ली और फिर आपस में ठिठोली करते सड़क पर आ गए थे ।
छोटे से गांव में बने छोटे से पार्क की खूबसूरती और व्यवस्था देख वे दंग थे । चारों तरफ की चारदीवारी के भीतर श्रंखलाबद्ध अशोक के वृक्ष ! रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियों के बीच हरी मलमली घास ! बच्चे और बड़ों के लिए तरह-तरह के झूले । पार्क के बीच छोटे से तालाब के बीच रंग-बिरंगी रौशनी में संगीत की धुन पर थिरकते तीन फव्वारे ! तालाब किनारे बच्चे और बड़ों के नाचने, झूमने के लिए अलग-अलग स्टेज ! साफ-सफाई ऐसी कि बड़े-बड़े महानगरों की व्यवस्था भी इसके सामने फेल थी । दोनों एक जोड़े वाले झूले में बहुत देर तक झूलते और फिर नाचते, झूमते रहे थे !
रोज जब से पार्क से वापस लौटी थी, बेहद खुश और उत्साहित थी । लिलि ने पिछले पांच साल में कभी रोजी को इतना खुश नहीं देखा था । वह खुशी से बार-बार लिलि से लिपट कर उसे प्यार करती चूमती रही थी । लिलि ने आज तक रोजी के चेहरे की वो चमक नहीं देखी थी, जिसे देखता हुआ वो आज रोजी के अपना होने पर मन ही मन इतरा रहा था । लिलि ने रोजी को गोद में उठा बिस्तर पर सुलाया तो रोजी ने झट उसे भी बिस्तर पर खींच लिया था । वह लिलि के सीने को तकिया बना उस पर सिर रखती बोली थी - " जानते हो लिलि, आज मैं इतनी खुश क्यों हूँ ? "
ऊंहूं ! नहीं तो । बताओ, क्यों ? " रोज की जुल्फों को अपनी उँगलियों से सहलाते हुए पूछा था लिलि ने ।
" मुझे मेरा जीवन लक्ष्य मिल गया है आज ! सचमुच बहुत खुश हूँ मैं आज ! " रोज ने बात खत्म करते हुए एक बार फिर जोर से चूम लिया था लिलि को ।
रोज को चूमते हुए पूछा था लिलि ने - " अब बता भी दो मुझे, आखिर क्या करेंगे हम दोनों भविष्य में ! "
" मैं तुम्हारे साथ मिलकर जार्ज के गांव को कोरोना गांव जैसा बनाऊंगी ! तुम ज्यादा समय नहीं भी दे पाओगे तो कोई बात नहीं, मैं एडजस्ट कर लूंगी । "
" वेरी गुड ! अपनी रोज की खुशबू से उसके जार्ज के गांव को महकाने में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ! "
" थैंक्स लिलि ! मेनी-मेनी थैंक्स ! आई लव यू लिलि - - आई लव यू - - - "
सुबह उठते ही दोनों फ्रेश हो मार्निंग वाॅक के लिए निकल गए थे । गांव के बांई तरफ भी एक पार्क था । ठीक वैसा ही, फर्क यह था कि इसमें मार्निंग वाॅक और योगा के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी । इसमें तालाब, फव्वारे और संगीत की सुविधा नहीं थी, पर वृक्षों और फूलों की भरमार थी । दोपहर में उन्होंने गांव के मध्य भाग से जाने वाले मार्ग पर एक किलोमीटर दूर स्थित नदी के किनारे बने वाटर पार्क का खूब आनंद लिया था । सर्दी का मौसम होने के बावजूद वे एक-दूसरे से ठिठोली करते पानी में देर तक खेलते रहे थे ।
होटल के पीछे बने कमरों के बीच एक बड़े बगीचे के मध्य भाग में छोटा सा मैदान था । जहां आज शाम को गांव के विकास से जुड़े कुछ लोगों के साथ करनी देवी की छोटी सी सभा होनी थी । सभा के बाद रात्रिभोज का प्रबंध था । रोज मैनेजर से पूछ रही थी - हमारी उनसे व्यक्तिगत मुलाकात कब संभव है ? "
" अभी थोड़ी देर बाद सभागार में उनकी ग्राम समिति की मीटिंग है, जो लगभग दो घंटे चलेगी । उसके बाद रात्रिभोज ! आप दोनों को भी उनकी तरफ से रात्रिभोज के लिए निमंत्रण है ! "
" ओह, थैंक्स ! क्या आपने उनसे हमारा जिक्र किया था ? "
" जी ! जितना मैं आपलोग को समझ पाया ! मीटिंग के बाद उनके आते ही मैं आपलोग को बुलवा लूंगा । "
" थैंक्स सर ! मेनी-मेनी थैंक्स ! " कहती हुई रोज अपने कमरे की तरफ बढ़ गई थी ।
लगभग दो घंटे बाद मीटिंग खत्म होते ही मैनेजर ने अपने कर्मचारी को भेज रोज और लिली को बुलवा लिया था । वह उन्हें लेकर उपर उस हाॅल में ले आया था, जहां रात्रिभोज शुरू होने को था ।
" बहन जी, ये हैं रोज और लिलि, अमेरिका से आए हैं ! " मैनेजर ने परिचय कराया तो रोज, लिलि और करनी देवी तीनों ही एक साथ हाथ जोड़ते " नमस्ते " कह रहे थे । अपने इस एक साथ के अभिवादन पर तीनों ही मुस्कुराए थे ." आइए, पहले सबके साथ भोजन कर लें, फिर आराम से बात होगी ! " कहते हुए करनी देवी ने अभिवादन पूर्वक चलने का इशारा किया था ।
भोजन करते हुए रोज और लिलि करनी देवी से नजरें बचाकर उनकी सुंदरता को निहारते रहे थे । सांवला रंग, बड़ी-बड़ी झील सी गहरी आँखें ! तीखी नाक ! गुलाब की पंखुडियों से ओठ और पतली कमर के साथ छरहरा बदन ! कुल मिलाकर एक बेहद आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामी थी करनी देवी !
लगभग एक घंटे बाद जब सभा में आए सभी लोग जा चुके थे, कोने में लगे सोफे पर बैठे वे तीनों बातें कर रहे थे ।
" मैडम, आपने एक सपना देखा । इरादा किया और फिर उसे पूरा भी किया । लगभग एक साल पहले मैंने एक न्यूज चैनल पर आपके गांव के बारे में सुना था, तब से यहां आने की इच्छा थी । आकर बहुत अच्छा लगा ! जितना पढ़ा और सुना था, उससे कहीं ज्यादा खुबसूरत है आपका गांव ! पहले टेलीविजन, फिर मैग्जीन और फिर मैनेजर साहब से कुछ जानकारी मिली आपके बारे में, पर बहुत कुछ और जानने की जिज्ञासा है ! यदि आप चाहें ! " कहते हुए रोज की आँखों में कृतज्ञता के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे ।
रोज की बात खत्म होते ही गंभीर हो चुकी करनी देवी ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा था - " सपना देखा पर पूरा नहीं हुआ है अभी ! जब तक इस गांव में एक सुविधा युक्त बड़ा अस्पताल ना बन जाए और यह गांव अपनी प्राथमिक और जरूरी सुविधाओं के हिसाब से आत्मनिर्भर ना हो जाए ! "
" आपके गांव में अस्पताल तो है, जिस तरह गांव का विकास हो रहा है, बड़ा अस्पताल भी बन जाएगा, पर आत्मनिर्भर - - ? "
" हाँ, हम गांव वालों का सपना है कि फल, सब्जी और दुध की तरह पीने के साथ कृषि के लिए पानी, बिजली और अनाज की अपनी जरूरतों के लिए भी हम आत्मनिर्भर बनें । दुध उत्पादन बढ़ाने के लिए एक गौशाला का निर्माण करना है, जिसमें गोबर से बनने वाली जैविक खाद निर्माण के संयंत्र के साथ गोमूत्र से बनने वाली औषधि के सयंत्र सयंत्र भी हो । कृषि के क्षेत्र में साल में तीन फसल पाने के लिए हमें बरसात के पानी का पूरा सदुपयोग करना है । हर घर में वाटर हार्वेस्टिंग बनाने के साथ एक डेम का निर्माण करना है । भविष्य में अन्न, फल और सब्जी भंडारण के लिए एक कोल्ड स्टोरेज की भी जरूरत होगी । जरूरत की बिजली के लिए सोलर एनर्जी तकनीक के इस्तेमाल की योजना है । उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक इंजीनियरिंग कॉलेज और एक बीएड काॅलेज का निर्माण यहां सरकार करवा रही है पर दबाव मुक्त प्राइमरी एजुकेशन के लिए हमारे पास एक बेहतर बचपन शिक्षा योजना है, जिस पर हमें आगे बढ़ना है । फिर कुछ घरेलू उधोगों के विकास की योजना भी है ! इतना कुछ करने के बाद हम कह सकेंगे, कि हमने सचमुच एक माॅडल और डेवलप विलेज अर्थात विकसित गांव बना लिया है ! "
रोज और लिलि ने देखा यह सब बताते हुए करनी देवी के शब्दों में अपने लक्ष्य को हासिल करने की दृढ़ता थी । चेहरा सफल होने के आत्मविश्वास से भरा हुआ था ।
रोज ने हाथ जोड़ते हुए कहा था - " एक अंतिम सवाल और मैडम ! "
" जी पूछिए ! "
" आखिर वो कौन सा वक्त था, जब आपने इस गांव को एक समृद्ध और आत्मनिर्भर गांव बनाने का संकल्प लिया था ? प्लीज ! मैं वो सबकुछ जानना चाहती हूँ, जो शायद आज तक आपने किसी को भी नहीं बताया होगा । आप मुझे अपनी छोटी बहन समझ कर यदि सब कुछ बता पाएं तो - - प्लीज ! "
सवाल कर चुकी रोज अब भी हाथ जोड़े जवाब की प्रतीक्षा में थी, जबकि स्थिति को देखते हुए लिलि ने वहां से जाना ही उचित समझा था । वह तुरंत आने की बात कह जा चुका था । करनी देवी रोज के मुंह से छोटी बहन वाली बात सुन भावुक हो गई थी । वह रोज का हाथ अपने हाथों में लेती हुई गंभीर होती चली गई थी । कुछ समय के लिए वह वहां होते हुए भी अपने अतीत में खोती चली गई । उसकी आँखों के सामने उस काली रात का अंधकार और अपने बीमार पति का वो मुस्कराता मुखड़ा था, जिसकी आँखों से बार-बार आँसुओं का सैलाब फट पड़ता था । पांच वर्ष पूर्व की बात बताते हुए अतीत की उस सबसे भयावह रात में हुआ वो हादसा करनी देवी की नजरों के सामने चलचित्र सा गुजरता हुआ महसूस हो रहा था । वह तीस मार्च 2020 की मध्य रात्रि का समय था । जब करनी देवी की गोद में सिर रख कर दर्द भूलने की कोशिश करता उसका पति कामेश्वर उसे कह रहा था -
" कम्मू एक बात कहूँ ? "
" हूँ, कहो । "
" सचमुच बहुत प्यार करता हूँ तुमसे ! इतना कि मरना नहीं चाहता अभी - - बल्कि सच कहूँ तो कभी भी नहीं ! पता नहीं लोग उन्हें कैसे ज्ञानी, विद्वान और महान लोग कहते हैं, जिन्होंने इस अद्भुत मानवीय जीवन को छोड़कर मोक्ष की कामना की ओर फिर घर-बार, परिवार, पत्नी सबको छोड़कर जंगलों में या फिर पहाड़ों पर तपस्या करने चले गए ! उस मोक्ष के लिए, जो कम से कम मुझे तो बिल्कुल उचित नहीं लगता । " बोलते हुए वह एकटक करनी देवी को देखे जा रहा था ।
" मोक्ष जीवन चक्र से मुक्ति और ईश्वर में समाहित होने की क्रिया है ! यह इतना सरल नहीं ! "
" पर क्यूं ? मानवीय जीवन से मुक्ति ही क्यों ? जिस जीवन को जीने की लालसा में ईश्वर भी बार-बार धरती पर आते हैं ! जिस मनुष्य जीवन में इतनी शक्ति है, कि वह अपनी तपस्या से ईश्वर को अपने पास बुला लेता है ! उसका साक्षात्कार करता है ! जिस जीवन में तुम्हारी जैसी प्रेयसी और पत्नी के साथ एक अद्भुत, रोमांचक और शानदार जीवन जीया जा सकता है, भला उससे मुक्ति ही क्यों ? फिर परिवार, समाज, देश और दुनिया का ये सुनहरा खेल ! मेलजोल ! बेहतर जीवन जीने के सलीके इजाद करने की निरंतरता ! आने वाली हमारी अगली पीढ़ियों के लिए और बेहतर माहौल तैयार करना ! चलो, जीवन का अंत निश्चित है तो भी, यह तो सच है ना कि यह दुनिया तो रहेगी ही - - - और फिर वो पुनर्जन्म की बात - - अर्थात, हम फिर जन्म लेंगे ! फिर वो बचपना ! जवानी ! मैं दीवाना और तुम दिवानी ! अहा ! बहुत खुबसूरत है ये जीवन ! बहुत खुबसूरत ! इसलिए - - अभी मरना नहीं चाहता मैं ! जीना चाहता हूँ ! सबसे पहले अपने लिए ! तुम्हारे लिए ! हमारे लिए ! फिर सबके लिए ! एक शानदार जीवन ! "
" तुम जियोगे ! कुछ नहीं होगा तुम्हें - - कुछ नहीं - - - " करनी देवी ने उसके माथे को सहलाते हुए कहा था ।
कामेश्वर ने करनी देवी के गले को बाहों में भरकर नीचे झुका लिया था उसे । फिर उसके थरथराते ओठों को अपने ओठों के भीतर कैद कर लिया था - - और फिर जैसे धरती पर होता है दो नदियों का संगम ! दोनों ही रसपान करने लगे थे उस मिठास का, जिसका स्वाद उन दोनों को ही बहुत पसंद था ! हमेशा थक कर अलग होने वाली कम्मू गोद में सिर रख कर सोये हुए अपने कामुक को उस दिन रोकी नहीं थी । झुकी रही थी बहुत देर तक उसके चेहरे पर ! करनी देवी भावुकता के आगोश में थी । उसके कानों में शाम को गांव के डॉक्टर साहब की कही हर बात गूँज रही थी - " मैंने दवा दे दी है । दर्द का इंजेक्शन भी लगा दिया है । आज रात भर दर्द से आराम रहना चाहिए, पर कल किसी भी तरह आसपास के किसी गाँव से गाड़ी का इंतजाम कर इन्हें शहर ले जाना होगा, वर्ना परेशानी हो सकती है । काश ! अभी हम किसी तरह कोई गाड़ी का इंतजाम कर पाते तो अभी ही ले जाते इन्हें, पर दुर्भाग्य से इस गांव में किसी के पास गाड़ी भी नहीं । बगल के गांव में एक परिचित के पास है भी तो वह शहर गई हुई है । मोटरसाइकिल से शहर तक का इतना लंबा सफर इनकी ऐसी स्थिति में संभव नहीं । आप चिंता ना करें मैं सुबह होते ही गाड़ी का इंतजाम करने की कोशिश करूंगा । " उनकी बात याद आते ही वह सिहर उठी उसकी आँखों से आँसुओं की धारा फुट पड़ी थी, जो कामेश्वर के गालों तक जा पहुंची थी । वह चौंक कर अपनी कम्मू के चेहरे को हथेलियों में भरता हुआ बोला था - " अरे कम्मू ये क्या ! लगता है डर गई मेरी बात सुनकर ! अरे पगली, कुछ नहीं होगा अभी मुझे ! तु चिंता मत कर । "
" कामुक, एक बात कहूँ तुमसे ! "
" हाँ कहो ना । "
" अगर तुम्हें कुछ हो गया न, तो मैं भी जिंदा नहीं रहूँगी - - "
इससे पहले कि वह आगे कुछ और कहती, कामेश्वर ने उसके थरथराते ओठों पर अपनी उंगली रखते हुए कहा था - " पहली बात तो यह कि मुझे कुछ नहीं होगा और दूसरी बात यह कि अगर कुछ हो भी गया तो बस कुछ ही दिन बाद मैं फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा, तुम्हारी गोद में तुम्हारा बच्चा बनकर ! कम्मू एक बात याद रखना, यदि मुझे इलाज के अभाव में कुछ हो गया तो कुछ ऐसा करना कि आने वाले समय में हमारे इस प्यारे गांव में फिर कभी किसी प्रेमी कामुक को अपनी कम्मू से असमय अलग ना होना पड़े । आह - - - "
" क्या हुआ ? " करनी देवी चौंकी थी । उसने कामेश्वर को गौर से देखा था । वह अचानक उठे दर्द से तड़पता हुआ जोर से उसकी दोनों बाहों को पकड़ लिया था । वह कुछ कहने का असफल प्रयास कर रहा था और करनी देवी घबराई सी सुनने का । इससे पहले कि वह कुछ कहती, कामेश्वर ने उसको खींच कर जोर से बांहो में भर लिया था । वह दर्द में भी करनी का मुखड़ा चूमे जा रहा था और मारे भय के अर्द्ध विक्षिप्त सी बड़बड़ाती हुई वह उसका " कुछ नहीं होगा - - कुछ नहीं होगा तुम्हें - - - उम्म - - उम्म - - -छोड़ो मैं डॉक्टर साहब को बुलाती हूँ - - - वो इंजेक्शन - - उफ्फ ! कामेश्वर के हाथों की पकड़ ढीली पड़ती चली गई थी । उसकी गोद में उसका सिर लुढ़क गया था । उसकी दोनो आँख खुली हुई थी, मानों वह अब भी एकटक अपनी कम्मू को निहार रहा हो - - - इस बात से अनजान कि उसकी कम्मू बेसुध उसे गोद में सुलाए घंटों उसकी उस नब्ज को टटोलती रही थी, जो कब की ठंडी पड़ चुकी थी । उसका सीना सहलाती, उसका मुखड़ा चूमती वह रोती बिलखती सुबह होने तक दुलारती रही थी उसे !
पहली बार उस रात की हर एक बात बताती हुई करनी देवी रोती सिसकती रही थी । साथ में रोती रही थी उनकी आपबीती सुनती रोज भी । इस दौरान दोनों कई बार एक दूसरे को बाहों में भर चुप कराती रही थी । करनी देवी ने बात खत्म करते हुए रूंधे गले से कहा था - " मैं अपने ससुराल में अकेली थी । उनके पिताजी की मृत्यु मेरी शादी के चार वर्ष पूर्व एक सड़क दुर्घटना में हुई थी और शादी के दो वर्ष बाद उनकी माताजी की मृत्यु कैंसर से । जिसमें उन्होंने अपनी जमा पूंजी खर्च कर दी थी । तंबाकू सेवन करने के कारण उनकी माताजी को गले का कैंसर हुआ था । इसलिए हमनें उनकी इच्छानुसार इस गांव को अब नशामुक्त गांव बना दिया है । उनकी मृत्यु के छह महीने बाद मुझे पुत्र हुआ था । यही मेरी अब तक की पूरी कहानी रही है । " आँखों से गिरती आँसुओं की धार को अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछती हुई करनी देवी ने मुस्कराने की कोशिश करते हुए रोज को देखा तो एक बार फिर से रोज ने झुक कर उन्हें गले से लगा लिया था । ऐसा करते हुए रोज खुद सिसक उठी थी ।
करनी देवी के गले पर रोज की आँसू की बूँदे टपक रही थी । करनी देवी ने खुद को संभालते हुए अब उसे चुप कराते हुए कहा था - " मेरी आपबीती सुन तुम्हारा यूं बार-बार भावुक होना और रोना तुम्हारे भीतर की किसी व्यथा की ओर इशारा करता है । क्या हुआ है तुम्हारे साथ ? यदि तुम चाहो तो बता सकती हो । सच मानो बहन, दिल हल्का हो जाता है इससे । मैंने आज पहली बार तुम्हें ही उस रात की हर बात बताई है ! क्यों, मुझे भी नहीं मालूम, पर सचमुच कलेजे के भीतर कहीं कुछ अटका सा हुआ था, जो आज बाहर निकल गया है । थोड़ा हल्का महसूस कर रही हूँ । " कहते हुए करनी देवी ने रोज का गुलाबी मुखड़ा अपनी हथेलियों में भर लिया था । फिर उसकी आँखों में झांकने की कोशिश करते हुए उसके दोनों गालों को चूमते हुए पूछा था - " क्या है दिल में ? कह दो बहन । "
" दीदी, मैंने भी दुनिया के सबसे विकसित और शक्तिशाली देश में रहते हुए अपना पहला प्यार खोया है ! वहां के एक अविकसित और पिछड़े गांव के कारण । उसी कोरोना संक्रमण के दौरान, जब आपने अपने प्रेमी पति को खोया था । वह एक तेजस्वी छात्र था, जो स्कॉलरशिप पाकर न्यूयार्क के एक अच्छे काॅलेज में मेरे साथ पढ़ाई कर रहा था । संक्रमण के कारण लाॅकडाउन होने के एक दिन पहले ही वह अपने गांव गया था । दुर्भाग्य से वह मेरे कारण ही कोरोना संक्रमित हो चुका था । उसे भी आपके पति की तरह मेरे ओठों का रस बहुत भाता था ! पर, ये उसकी जान जाने का बड़ा कारण बना । मैं उसे छोड़ने रेलवे स्टेशन गई थी, तभी उसने आखिरी बार चूमा था मुझे ! उसको स्टेशन छोड़कर आने के बाद मुझे समाचार मिला था कि मेरे माता-पिता कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं । उसी दिन शाम को मेरी भी जांच हुई और अगले दिन शाम को मैं भी हास्पिटल में भर्ती हो चुकी थी । मेरे संक्रमित होने की सूचना मिलते ही मैंने उससे संपर्क करने की बहुत कोशिश की थी, पर समय रहते ये संभव नहीं हो पाया और जब बात हुई तब तक बहुत देर हो चुकी थी - - - । " सुबकती हुई अपनी आपबीती सुनाती रोज आगे कुछ कह ना पाई, वह फफक उठी थी । द्रवित हुई करनी देवी की आँखें भी बरस रही थी । वह उठकर रोज को कलेजे से भींचे बहुत देर तक खुद रोती हुई उसे चुप कराने का असफल प्रयास करती रही थी । पर दर्द और आँसूओं की भी एक सीमा होती है । दुख कितना भी गहरा और बड़ा हो आँसूओं से खत्म ना सही कम तो हो ही जाता है । जी भरकर रोने के बाद बहुत देर तक वे एक दूसरे को ढाढस बंधाती आने वाले जीवन के बारे में बातें करती रही थी ।
अगले दिन से रोज और लिलि दोनों समय का भोजन करनी देवी के साथ उनके घर पर करते थे । दो दिन बाद रोज और लिलि जाना चाहते थे पर करनी देवी के आत्मीय आग्रह और अपनापन के कारण उन्हें अगले एक सप्ताह तक वहीं रूकना पड़ा था । अंतिम चार दिन तो उन्होंने करनी देवी के आग्रह पर उनके घर में ही साथ रहकर व्यतीत किए थे ।
सप्ताह भर बाद बिदा होते समय रोज ने करनी देवी के चरण छूकर प्रणाम करने के बाद उनको बांहो में भरते हुए कहा था - " दीदी, अब आपकी छोटी बहन को अपने घर में आपकी सेवा का अवसर दिए जाने का इंतजार रहेगा ! एक बात और बता दूं आपको, अगले कुछ वर्षों में अमेरिका में भी एक कोरोना गांव होगा ! ठीक इसी गांव जैसा ! जिसके मुख्य समारोह की मुख्य अतिथि भी आप ही होंगी ! "
करनी देवी रोज की बात सुन चौंकी तो रोज ने मुस्कराते हुए कहा था - " हाँ दीदी, जार्ज के गांव को मैं विकसित गांव बनाऊंगी ! ठीक आपके कोरोना गांव जैसा, ताकि भविष्य में अमेरिका में जार्ज के गांव में भी किसी दूसरे जार्ज को - - - किसी अभाव में - - - अपने प्राण - - ना गंवाने पड़ें - - "
उसकी बात पूरी होने से पहले ही करनी देवी ने उसे अपने सीने से लगा लिया था !
सीता राम शर्मा " चेतन "रांची, झारखंड
संपर्क - 9431519111, 8935801111



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