......लाठी होने की वजह से यादव किसी से
डरता नहीं था पर सरकार में भागिदारी न
होने से दबा दिया जाता था........
नोट:- इस लेख को अपनी-अपनी जातिय कुंठा से बाहर आकर पढ़ना है। लेखक खुद ब्राह्मण हैं। लेकिन जिस पेशेवर ईमानदारी के साथ यह लेख लिखा गया है ऐसा बहुत कम लोग लिख पाते हैं।
जो चाईबासा ट्रेजरी केस/चारा घोटाला केस के इंवेस्टिगेटिंग इंचार्ज थे, सौभाग्यवश उन्हीं के under मेरी ट्रेनिंग हुई थी। कायस्थ थे और most brilliant अफसर। वो खुद बताया करते थे कि लालू को तो पता ही नहीं था कि ऐसा कुछ स्कैम हो रहा है। लालू के आने से दस साल पहले से चल रहा था, और ट्रेजरी के सारे अफसर मिल कर फर्जी बिल डालते रहते थे। पूर्व में मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ मिश्रा असली kingpin थे और उनको हिस्सा जाया करता था। लालू ने तो शिकायत की थी। दरअसल उस समय लालू ने मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में सदियों से चले आ रहे भूमिहार ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती दे दी थी। यादव शुरू से एक assertive caste थी जिसके पास जमीन तो थी, लठ बल भी था पर सत्ता नहीं थी, सरकारी नौकरी नहीं थी। जमीन (इसमें पशु भी शामिल हैं) और लाठी होने की वजह से यादव किसी से डरता नहीं था पर सरकार में भागीदारी न होने की वजह से दबा दिया जाता था।
आज से 25 साल पहले OBC जातियों में आपस में झगड़ा नहीं था, कुर्मी, कोईरी, कुशवाहा, तेली, नोनिया सब लालू के साथ ही थे। इसी तरह दलितों में भी एका था और महादलितों में बंटे हुए नहीं थे। उत्तर भारत के गुर्जरों से लेकर पूर्वी बिहार के मल्लाह तक, सब के मसीहा लालू ही थे। लालू ने जो इन सब को सत्ता का रास्ता दिखाया, वो पहले से काबिज लोगों से हजम नहीं हुआ - भारत की feudal (सामंती) मानसिकता का नुक्सान। ऊपर से इस तरह के नारे की भूराबाल साफ करो - भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला (कायस्थ)! ऐसे नारों से ऊंची जाति वालों को भड़काना आसान था (ये नारा तथाकथित तौर पर लालू को attribute किया गया पर इसका कोई सबूत नहीं था और इस तरह की अफवाह फैलाना आसान था)। रही सही कसर यादवों में कुछ एक उन तत्वों ने पूरी कर दी, सत्ता आने के बाद जिनका दिमाग बौरा गया और बिहार की सड़कों पर बेमतलब की अराजकता और धौंसपट्टी शुरू कर दी। ऐसे में जोर गरीबों पर ही ज्यादा चलता है तो रिक्शा चालकों तक से लूटपाट हुई। भूमिहार, राजपूत तो अपनी सेनाएं बना कर लड़ लिए, पर दलित दोनों तरफ से कुचले गए। उस अराजक दौर का नुकसान आज तक RJD भुगत रही है। लोगों को 90 का दशक याद दिला कर डरा दिया जाता है।
फिर शुरू हुआ लालू को निपटाने का षडयंत्र। अब ब्राह्मण बुद्धि सामने आई और इसमें साथ दिया एक दलित IPS अधिकारी U N Biswas ने जो उस समय CBI के शायद Joint Director थे और पूर्वोत्तर के इंचार्ज। कहा जाता था कि वो बहुत बदतमीज अफसर थे और लालू से पहले के ब्राह्मण, ठाकुरों से तो पटती थी पर एक यादव का सिर पर बैठना बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसा किस्सा था कि लालू और बिस्वास का झगड़ा हुआ और लालू ने बहुत डांट पिलाई। और मौका मिलते ही बिस्वास साहब ने चारा घोटाले की फाइल में लालू जी को निपटा दिया।
CBI ने जो DA केस दर्ज किया था उसमें पूरा जोर लगा कर भी 32 लाख ही एक्स्ट्रा संपत्ति दिखा पाए थे। 1000 करोड़ के घोटाले में मुख्यमंत्री के पास 32 लाख! जबकि 32 लाख तो किसी PWD के क्लर्क के पास भी मिल जाएगा। बिस्वास साहब कुछ साल बाद रिटायरमेंट ले कर तृणमूल कांग्रेस से बंगाल में MLA बने शायद। खैर, उस समय लालू प्रसाद की सुनवाई कौन करता?
25-30 साल पहले मंडल कमीशन की शुरुआत मात्र थी और सारे महकमे, पुलिस, न्यायपालिका में ब्राह्मण, कायस्थ ही भरे होते थे। Caste wars के दिन थे। बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, दनवर बिहटा, एकवारी, सेनारी में नरसंहार हो रहे थे। और विडंबना ये कि दोनों तरफ के लोग blame लालू पर डाल रहे थे। भूमिहार, राजपूत सेनाएं तो पहले ही खिलाफ थीं, इन massacres का दोष IPF/MCC ने भी लालू पर डाल दिया। मतलब ये कि बिहार की caste churning में जो विष निकल रहा था उसमें न चाहते हुए भी नीलकंठ लालू को बना दिया।
fodder Scam (चारा घोटाला) केस की फाइल में जो मर्जी किया गया। लालू को कैसे फंसाया, क्या हुआ बाद में , इसको ब्रह्मा जी भी नहीं समझ सकते। कानून के बहुत पचड़े होते हैं। एक ही केस में बाइज्जत बरी से लेकर फांसी तक हो जाती है (इंदिरा गांधी केस में जहां केहर सिंह को फांसी हुई, वहीं बलबीर सिंह को राम जेठमलानी साफ बचा कर ले गए।)। लालू की किस्मत खराब की जिस BJP के विजय रथ को उन्होंने पकड़ लिया था और अडवाणी की मिट्टी खराब कर दी थी, वही BJP उनके केस का फैसला सुनाए जाने के समय बहुमत से सत्ता में थी ! तो लालू को जेल हो गई और kingpin पंडित जगन्नाथ मिश्रा बरी हो गए। सत्ता में रहने पर पाक साफ कोई भी नहीं रहता, और फंसाने पर आओ तो हर नेता को फंसा सकते हो।
लालू पर सौ आरोप लगा लो, पर वो कांग्रेस के बाहर देश के एकमात्र नेता हैं जिन्होंने rss/bjp से कभी समझौता नहीं किया। Rest is history. अभी वे जमानत पर बाहर आए हैं, केस तो चलता रहेगा। जज साहब के सामने क्या सबूत आएंगे, क्या फैसला आएगा ये तो भविष्य ही बताएगा। हो सकता है कि मेरी बात कुछ लोगों को अच्छी न लगे पर ये मेरी कानों सुनी, आंखों देखी है और खुद का अनुभव है। 24 साल बीत गए तो कुछ भूल हो सकती है, पर सार यही है - चारा घोटाला विशुद्ध जाति वर्चस्व की लड़ाई थी।:- Chetan Dutta (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 'CBI' सहित कई महकमों में काम करने का लंबा अनुभव, राज्यसभा-टीवी के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर)

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