श्री राम
राम नाम से भीग रहा हो जिसका भगवा रोज
उसके चरित्र में दाग तुम कैसे रहे हो खोज।।
मन निर्मल हो जाए मिट जाए मन का मैल
मन के बगीचे पनप रही श्री राम नाम की बेल।।
श्री राम नाम की अमृत वर्षा है सबसे अनमोल
भीग रहा मन इस बारिश में सब मोह माया छोड़।।
सिया राम की आज्ञा से , संस्कृति रहा जो खोज
धारण किया धर्म को जिसने,उसे काहे का क्रोध।।
धर्म की रक्षा करने हेतु जब श्री राम ने दिया घर छोड़
हम तुम तो इंसान हैं भैया हमारा काहे का फिर मोल ।।
प्रभु शरण में जो आ जाए, खुल जाए नयन के द्वार
मोह माया से परे रहे वो , न चाहें फिर मोहन भोग ll
दुनिया बहुत निराली है , यहां भांति भांति के लोग
सुमिरन कर श्री राम का , लोगों की सुनना छोड़ ।।
झूठे सच्चे इन आरोपों की और व्यर्थ की चिंता छोड़
राम नाम को जपता चल ,धर्म की रक्षा करता चल।।
प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर मध्य प्रदेश

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